वर्षों बाद ऐतिहासिक स्वरूप में लौटा रानीगंज का महावीर अखाड़ा, भाईचारे का दिया संदेश

रानीगंज। रानीगंज के महावीर अखाड़ा का इतिहास आजादी से पहले का है। उत्तर भारत से कारोबार और रोजगार के सिलसिले में यहां आए लोगों ने बंगाल की दुर्गापूजा परंपरा के साथ दशहरा उत्सव को भी अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाया। इसी क्रम में महावीर अखाड़ा रानीगंज की ऐतिहासिक और धार्मिक परंपरा का अभिन्न हिस्सा बन गया।

लेकिन आजादी के बाद बदलते राजनीतिक परिवेश में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लंबे शासनकाल के दौरान अखाड़ा को लेकर राजनीतिक परिस्थितियां लगातार जटिल होती गईं। बाद में तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में भी यह स्थिति बनी रही। परिणामस्वरूप, पिछले आठ वर्षों से पारंपरिक मार्ग पर महावीर अखाड़ा निकालने की परंपरा बाधित रही।

इस वर्ष रानीगंज के विधायक पार्थो घोष की सक्रिय पहल और समर्थन के बीच महावीर अखाड़ा ऐतिहासिक उत्साह के साथ निकला। पारंपरिक खेल-कौशल, पगड़ी वितरण और केसरिया ध्वजों से सजे शहर ने उत्सव की नई तस्वीर पेश की। व्यापक पुलिस सुरक्षा के बीच देर रात तक चले आयोजन ने रानीगंज में उत्साह का माहौल बना दिया।
महावीर अखाड़ा की भव्य वापसी ने यह सवाल भी उठाया कि आखिर वर्षों तक एक ऐतिहासिक परंपरा को लेकर ऐसी परिस्थितियां क्यों बनी रहीं। हालांकि, इस वर्ष का आयोजन धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकजुटता का संदेश लेकर आया। आठ वर्षों बाद लौटी इस परंपरा ने रानीगंज के लोगों में नई उम्मीद जगाई और शहर की ऐतिहासिक पहचान को फिर से सामने रखा।