तृणमूल शासन में पनपे कोल सिंडिकेट के खिलाफ गोलबंद हुए कारोबारी

शिल्पांचल में रंगदारी और सिंडिकेट राज पर ट्रेडर्स का खुला विद्रोह, नई सरकार से बड़ी उम्मीद,
विमल देव गुप्ता
रानीगंज :
पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद अब शिल्पांचल के कोयला कारोबार में वर्षों से जड़ जमा चुके कथित सिंडिकेट राज के खिलाफ खुलकर आवाज उठने लगी है। कोल ट्रेडर्स ने साफ कर दिया है कि अब ई-ऑक्शन के कोयले पर किसी भी प्रकार की रंगदारी नहीं दी जाएगी। कारोबारी संगठनों का आरोप है कि तृणमूल शासनकाल में कोयला उद्योग पर सिंडिकेट का ऐसा शिकंजा कस गया था, जिसने पूरे शिल्पांचल की आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित कर दिया। अब भाजपा सरकार बनने के बाद कारोबारी वर्ग खुलकर विरोध में उतर आया है और प्रशासन से सिंडिकेट पर तत्काल कार्रवाई की मांग कर रहा है।
पंजाबी मोड़ कोल ट्रेडर्स यूनियन की बैठक आयोजित की गई, जिसमें कोयला कारोबार से जुड़े बड़ी संख्या में व्यवसायी शामिल हुए। बैठक के बाद पंजाबी मोड़ पुलिस फांड़ी में ज्ञापन सौंपकर सुरक्षा और निर्बाध कोयला लिफ्टिंग सुनिश्चित करने की मांग की गई।
व्यवसायी सतीश खेमका ने कहा कि चार मई को चुनाव परिणाम आने के बाद से कई कोलियरियों में कोयला लिफ्टिंग पूरी तरह ठप है। आरोप लगाया कि पांडवेश्वर क्षेत्र के विजय सिंह और मैजूल नामक दो लोग विभिन्न कोलियरियों में पहुंचकर सिंडिकेट के नाम पर वसूली करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रति टन 2100 रुपये तक रंगदारी मांगी जा रही है और भुगतान नहीं करने पर कोयला उठाव रोक दिया जाता है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य तथा मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी लगातार सिंडिकेट और कटमनी खत्म करने की बात करते रहे हैं। ऐसे में व्यापारी वर्ग को उम्मीद है कि नई सरकार इस अवैध वसूली पर कठोर कार्रवाई करेगी।

30 वर्षों में पहली बार ऐसा संकट : कारोबारी
कोयला व्यवसायी सतीश खेमका ने कहा कि उनका परिवार लगभग 60 वर्षों से कोयला कारोबार से जुड़ा है, लेकिन ऐसा भयावह दौर पहले कभी नहीं देखा गया। पहले ट्रक चालकों और मजदूरों को स्वेच्छा से कुछ पारिश्रमिक दिया जाता था, लेकिन बाद में यह पूरी तरह संगठित रंगदारी में बदल गया। पैसा नहीं देने पर कोयला लोडिंग और परिवहन रोक दिया जाता था।
उन्होंने कहा कि रानीगंज का कोयला देश के सर्वश्रेष्ठ कोयलों में गिना जाता है, लेकिन भारी रंगदारी और अवैध वसूली के कारण इसकी लागत इतनी बढ़ गई कि स्थानीय व्यापारी दूसरे राज्यों के कारोबारियों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। परिणामस्वरूप कई छोटे कारोबारी आर्थिक संकट में पहुंच गए।
ऐसे विकसित हुआ कोयले का सिंडिकेट नेटवर्क
वर्ष 2020 में सीबीआई ने शिल्पांचल में अवैध कोयला कारोबार को लेकर व्यापक छापेमारी की थी। उस दौरान कई स्थानों पर ईसीएल के समानांतर अवैध ओसीपी चलाकर बड़े पैमाने पर कोयला उत्खनन किए जाने के आरोप सामने आए थे। कार्रवाई के बाद अवैध खनन पर कुछ हद तक रोक लगी, लेकिन बाद में ई-ऑक्शन के कोयले पर सिंडिकेट की पकड़ मजबूत होती चली गई।
कारोबारियों का आरोप है कि ईसीएल की लगभग सभी रोड सेल और रैक सेल परियोजनाओं में कोयला उठाव के लिए मोटी रकम वसूली जाती रही। सूत्रों के अनुसार, यह अवैध कारोबार प्रतिमाह सेकरो करोड़ रुपये तक पहुंच चुका था। इससे कोयले की कीमत लगातार बढ़ती गई और बाजार में मांग घटने लगी।
वर्षों से फलता-फूलता रहा कोयले का काला कारोबार
रानीगंज-आसनसोल कोयलांचल में अवैध कोयला कारोबार कोई नई बात नहीं है। समय-समय पर अवैध खनन, समानांतर ओसीपी संचालन, पोखरिया और खुली खदानों में आधुनिक मशीनों से अवैध उत्खनन जैसे मामले सामने आते रहे हैं। कारोबारी बताते हैं कि अलग-अलग राजनीतिक संरक्षण में यह नेटवर्क लगातार मजबूत होता गया और बाद में सिंडिकेट संस्कृति का रूप ले लिया।
हालांकि अब पहली बार अधिकांश कोल ट्रेडर्स एक मंच पर आते दिखाई दे रहे हैं। कारोबारियों का कहना है कि पहले जो लोग विरोध करते थे, उन्हें प्रताड़ना झेलनी पड़ती थी। कई बार जेल तक भेजा गया, लेकिन विरोध जारी रहा। अब व्यापारियों का दावा है कि बदलते राजनीतिक माहौल में वे खुलकर रंगदारी के खिलाफ लड़ाई लड़ेंगे।
व्यापारियों ने कहा कि अब देखने वाली बात होगी कि नई सरकार सिंडिकेट और माफियागिरी पर कितना प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर पाती है या फिर पुराने चेहरे नए रूप में कारोबार पर कब्जा बनाए रखते हैं।