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    एमडीओ मोड में महाबीर कोलियरी: उत्पादन, विकास और रानीगंज शहर की सुरक्षा—दोनों ओर बड़ी चुनौती

    Coalfield TahalkaBy Coalfield TahalkaFebruary 12, 2026Updated:February 12, 2026No Comments4 Mins Read
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    एमडीओ मोड में महाबीर कोलियरी: उत्पादन, विकास और रानीगंज शहर की सुरक्षा—दोनों ओर बड़ी चुनौती

    विमल देव गुप्ता
    रानीगंज।

    ऐतिहासिक महाबीर कोलियरी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) ने इस खदान को माइन डेवलप एंड ऑपरेट (एमडीओ) मोड में निजी कंपनी अमर महाबीर प्राइवेट लिमिटेड को सौंप दिया है। योजना के अनुसार आगामी दिसंबर 2026 से कोयला उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। यह निर्णय जहां ऊर्जा उत्पादन और राजस्व के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रानीगंज शहर की सुरक्षा और भविष्य को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े हो रहे हैं।

    25 वर्षों में 540 लाख टन कोयला निकालने की योजना
    एमडीओ समझौते के तहत निजी कंपनी को 25 वर्षों में लगभग 540 लाख टन कोयला खनन करना है। कंपनी को कोयला निकालने के साथ-साथ उसे बेचने का अधिकार भी दिया गया है, जबकि ईसीएल रेवेन्यू शेयरिंग मॉडल के तहत हिस्सेदार है। बिक्री से होने वाली आय का 14 प्रतिशत हिस्सा ईसीएल को मिलेगा। परियोजना क्षेत्र में ईसीएल की अपनी जमीन के अलावा लगभग 200 एकड़ अतिरिक्त भूमि अधिग्रहण प्रस्तावित है, जिसके बदले प्रभावितों को आर्थिक मुआवजा देने की बात कही गई है।

    महाबीर कोलियरी पहले एक भूमिगत (इंक्लाइन) खदान थी। नई निविदा शर्तों के अनुसार निजी कंपनी को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वह ओपन कास्ट प्रोजेक्ट (ओसीपी) या भूमिगत, जिस भी तरीके से उपयुक्त समझे, खनन कर सकती है। एमडीओ मोड की निर्धारित राशि कंपनी द्वारा ईसीएल में जमा कर दी गई है और फिलहाल तकनीकी सर्वेक्षण तथा परियोजना डिजाइन पर काम चल रहा है।

    1989 का हादसा और बंद खदान का इतिहास
    13 नवंबर 1989 को महाबीर कोलियरी में हुए भीषण हादसे के बाद से यहां खनन कार्य पूरी तरह बंद है। यह दुर्घटना देशभर में चर्चा का विषय बनी थी, जिसमें लोहे के कैप्सूल के माध्यम से 65 श्रमिकों की जान बचाई गई थी। इसी घटना पर फिल्म ‘रानीगंज मिशन’ भी बनी। महाबीर कोलियरी का इतिहास और भी पुराना है—यहीं से देश के शुरुआती कोयला खनन की शुरुआत मानी जाती है। पहले बंगाल कोल कंपनी और 1973 के बाद ईसीएल ने यहां खनन किया। हादसे के बाद खदान बंद हो गई और वर्षों से यह क्षेत्र तकनीकी, कानूनी और सुरक्षा विवादों में घिरा रहा।

    शहर के नीचे खोखली खदानें—सबसे बड़ा खतरा
    स्थानीय संगठनों और एनजीओ रानीगंज बचाओ कमेटी का आरोप है कि पुराने खनन के दौरान कई स्थानों पर कोयला निकालने के बाद बालू भराई (स्टोइंग) सही ढंग से नहीं हुई। इन खोखली जगहों में फिलहाल पानी भरा होने से स्थिति संतुलित बनी हुई है। लेकिन यदि यहां ओपन कास्ट खनन शुरू होता है, तो यह पानी बाहर निकल सकता है, जिससे धंसान का खतरा बढ़ेगा और रानीगंज शहर के कई घनी आबादी वाले इलाके प्रभावित हो सकते हैं।

    रानीगंज बचाओ मंच का विरोध
    रानीगंज बचाओ मंच और अन्य एनजीओ स्पष्ट कर चुके हैं कि वे कोयला खनन के विरोध में नहीं हैं, लेकिन ओसीपी के जरिए खनन का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि वैकल्पिक और सुरक्षित तकनीकों से खनन किया जाए, तो शहर को नुकसान से बचाया जा सकता है। इस संबंध में ईसीएल के सीएमडी को ज्ञापन भी सौंपा गया है। मंच का दावा है कि उन्हें आश्वासन मिला है कि रानीगंज शहर को नष्ट कर कोई ओसीपी नहीं बनाई जाएगी।

    ठेका कंपनी के सामने भी कठिन राह
    दूसरी ओर, परियोजना को लागू करना निजी कंपनी के लिए भी आसान नहीं है। ईसीएल द्वारा पूर्व में किए गए खनन, पुराने रिकॉर्ड की कमी, अवैध खनन से हुए नुकसान और घनी आबादी—ये सभी बड़ी चुनौतियां हैं। स्थानीय लोगों को मुआवजा देकर हटाना और सुरक्षित तरीके से कोयला निकालकर मुनाफा कमाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। बार-बार सर्वेक्षण हो रहे हैं, लेकिन जोखिम और अनिश्चितताएं बनी हुई हैं।

    महाबीर कोलियरी का पुनः आरंभ होना ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार के लिहाज से महत्वपूर्ण है, लेकिन यह तभी सार्थक होगा जब रानीगंज शहर की सुरक्षा, पर्यावरण संतुलन और स्थानीय लोगों के अधिकारों को प्राथमिकता दी जाए। चुनौती दोनों तरफ है—सरकार और कंपनी के लिए सुरक्षित, टिकाऊ खनन सुनिश्चित करना, और स्थानीय समाज के लिए अपने शहर व भविष्य की रक्षा करना। आने वाले समय में यही संतुलन इस परियोजना की सफलता या विफलता तय करेगा।

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