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    प्रशासनिक सुस्ती और दोहराव के बीच रानीगंज बना “मृत शहर”, व्यवसाय और जीवन दोनों संकट में

    Coalfield TahalkaBy Coalfield TahalkaJuly 5, 2025No Comments4 Mins Read
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    प्रशासनिक सुस्ती और दोहराव के बीच रानीगंज बना “मृत शहर”, व्यवसाय और जीवन दोनों संकट में

    बिमल देव गुप्ता

    रानीगंज । कोयला नगरी रानीगंज आज अपनी ही विरासत के बोझ तले दबती जा रही है। भू-धंसान, भूमिगत गैस रिसाव और सरकारी निर्णयों के अभाव में यह ऐतिहासिक क्षेत्र आज एक सामाजिक और आर्थिक संकट का केंद्र बन गया है।

    वर्ष 2009 में केंद्र सरकार द्वारा स्वीकृत रानीगंज मास्टर प्लान को आज 16 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन पुनर्वास की दिशा में अब तक कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाया है। केंद्र सरकार जहां इसकी विफलता के लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है, वहीं स्थानीय प्रशासन ने भी स्थिति को जटिल बना दिया है।

    नगर निगम ने निर्माण नक्शों पर लगाई रोक

    भू-धंसान की गंभीरता को देखते हुए नगर निगम ने 300 मीटर दायरे में नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी है। निगम अध्यक्ष मुजम्मिल शहजाद ने कहा कि यह निर्णय उच्च स्तर से मिले आदेशों के आधार पर लिया गया है।

    हालांकि स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि जब पूरा रानीगंज क्षेत्र ही भू-धंसान प्रभावित है, तो निर्माण कार्य आखिर हो कहां सकता है?

    विकास योजनाएं जहां ठप पड़ी हैं, वहीं आम नागरिक भय, भ्रम और असुरक्षा के बीच जी रहे हैं। रानीगंज सिटीजन फोरम के अध्यक्ष गौतम घटक का कहना है कि प्रशासनिक असमंजस ने रानीगंज को “मृत नगर” बना दिया है।

    व्यापार-व्यवस्था पर पड़ा प्रतिकूल असर

    कोयला आधारित कारोबार पर निर्भर रानीगंज का व्यापारिक क्षेत्र गहरे संकट में है। रियल स्टेट पूरी तरह से ठप है।  सैकड़ों फ्लैट बन कर तैयार है न तो ग्राहक हैं, न ही निवेशक। जो निवेश कर चुके हैं, वे भी अब अग्रिम राशि वापस मांगने लगे हैं। जमीन के प्लाटिंग के बाद दी गई एडवांस भी वापस मांगने लगे हैं।

    रानीगंज चेंबर ऑफ कॉमर्स के मुख्य सलाहकार आर. पी. खेतान ने कहा कि यदि यह स्थिति यूं ही बनी रही, तो रानीगंज का व्यापारिक अस्तित्व समाप्त हो सकता है।

    ₹11,000 करोड़ की योजना, पर काम न के बराबर

    ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) के अनुसार, मास्टर प्लान की लागत ₹2,610 करोड़ से बढ़कर अब ₹11,000 करोड़ हो गई है। आसनसोल-दुर्गापुर विकास प्राधिकरण  को ₹850 करोड़ का भुगतान भी किया जा चुका है।

    अब तक 4560 फ्लैट तैयार हो चुके हैं, लेकिन पुनर्वास की प्रक्रिया बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही है। अगर केंद्र और राज्य सरकारें एकमत नहीं हुईं, तो यह योजना भी फाइलों में दबकर रह जाएगी।

    रानीगंज के उत्तरी क्षेत्र एवं पश्चिमी क्षेत्र  जैसे क्षेत्रों में नियमों की अनदेखी

    रानीगंज के उत्तर दिशा में बसे बसरा, बरदही, अमर सोता और महावीर कोलियरी जैसे इलाकों में पहले भू-धंसान और गैस रिसाव की घटनाएं हो चुकी हैं। बावजूद इसके, वहां अब भी निर्माण कार्य जारी हैं।

    अड्डा के अध्यक्ष कवि दत्त ने चेंबर कॉमर्स में कार्यक्रम के पश्चात बताया की आईआईटी खरगपुर की रिपोर्ट के अनुसार, यह क्षेत्र 500 मीटर तक खतरनाक श्रेणी में आता है। इसके बाद भी 300 मीटर की छूट दी गई है। “प्रमोटर राज” पर लोगों की नाराज़गी

    सर्वेक्षण के दौरान एक स्थानीय निवासी ने बताया, “यहां प्रमोटरों के जरिए जो काम करवाना हो, हो जाता है। बाद में अगर कोई दुर्घटना हो भी जाए, तो कोई जवाबदेह नहीं होता।”

    यह बयान न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही की पोल खोलता है, बल्कि एक संवेदनहीन सिस्टम की ओर भी इशारा करता है।

    रानीगंज की स्थिति अब केवल प्रशासनिक विफलता का परिणाम नहीं, बल्कि एक मानवजनित आपदा बन चुकी है। केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि वे आपसी मतभेद भुलाकर समयबद्ध और पारदर्शी तरीके से पुनर्वास योजना को लागू करें।

    अन्यथा यह ऐतिहासिक नगरी, जो कभी उद्योग और व्यापार का केंद्र रही, इतिहास के पन्नों में एक बर्बाद शहर बनकर दर्ज हो जाएगी।

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